वो आखिरी ट्रेन

दिल्ली की रातें हमेशा भागती रहती हैं। मेट्रो स्टेशन पर लोगों की भीड़, जल्दी में दौड़ते कदम और लगातार आती-जाती ट्रेनें—सब कुछ शोर से भरा था। लेकिन उस भीड़ में नील सिर्फ एक चेहरे को देखता था।

सफेद कुर्ते में खड़ी लड़की… अवनि।

नील उसे रोज़ इसी समय देखता था। वह हमेशा प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर खड़ी रहती, हाथ में किताब और चेहरे पर हल्की मुस्कान।

नील कई बार उससे बात करना चाहता था, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाता।

एक रात आखिरी ट्रेन बहुत लेट थी। स्टेशन लगभग खाली हो चुका था। सिर्फ नील और अवनि वहीं थे।

नील ने आखिर हिम्मत की।

“आप रोज़ यही ट्रेन लेती हैं?”

अवनि मुस्कुराई।

“और आप रोज़ मुझे देखते हैं।”

नील झेंप गया। लेकिन अवनि की हँसी में अपनापन था।

धीरे-धीरे दोनों बातें करने लगे। किताबें, सपने, पसंदीदा जगहें, जिंदगी…

नील को पहली बार लगा जैसे कोई उसे सच में समझ रहा हो।

उस रात ट्रेन आई, लेकिन दोनों का मन जाने का नहीं था।

फिर ये सिलसिला रोज़ का बन गया। दोनों आखिरी ट्रेन का इंतजार करते और घंटों बातें करते।

एक दिन अवनि नहीं आई।

नील बेचैन हो गया

अगले दिन भी नहीं।

पूरा हफ्ता गुजर गया।

नील हर रात उसी प्लेटफॉर्म पर इंतजार करता रहा।

फिर एक दिन स्टेशन की बेंच पर उसे एक किताब मिली।

उसके अंदर एक चिट्ठी थी।

प्रिय नील,
पापा का ट्रांसफर हो गया है। बिना बताए जाना पड़ा।
लेकिन शायद कुछ लोग जिंदगी में हमेशा याद रहने के लिए आते हैं।
जब भी आखिरी ट्रेन देखना… मुझे याद कर लेना।
— अवनि”

नील की आँखें नम हो गईं।

उस रात ट्रेन फिर आई, लोग फिर भागे, लेकिन नील वहीं खड़ा रहा।

क्योंकि कुछ लोग चले जाने के बाद भी जिंदगी में हमेशा रह जाते हैं।

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